भक्तिः, यथा —
गिरिवर-भृति भर्तृ-दारके’स्मिन्
व्रज-युवराजतया गते प्रसिद्धिम् ।
शृणु रसद सदा पदाभिसेवा-
पट्टिमरता रतिर् उत्तमा ममास्तु ॥३.२.४७॥
अनुवाद
रक्तक की भक्ति: "हे रसद, सुनो! मैं सदैव उनके चरणकमलों की सेवा के प्रति परम आकृष्ट रहूँ जो व्रजराज के पुत्र के रूप में प्रसिद्ध हैं और जिन्होंने गोवर्धन को धारण किया हुआ है।"
Raktaka's devotion: "O Rasada, listen! May I always be highly attracted to the service of the lotus feet of him who is renowned as the son of Vrajaraja and who holds Govardhana."
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥