श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 3: पश्चिमी विभाग: मुख्य भक्ति रस  »  लहर 1: शांत-रस (ईश्वर का शांत प्रेम)  »  श्लोक 50
 
 
श्लोक  3.1.50 
स्थायिनम् एके तु निर्वेद-स्थायिनं परे ।
शान्तम् एव रसं पूर्वे प्राहुर् एकम् अनेकधा ॥३.१.५०॥
 
 
अनुवाद
"पूर्व विद्वानों ने शांत-रस के अनेक प्रकारों का वर्णन करते हुए कहा है कि धृति या निर्वेद भी शांत-रस का स्थिर-भाव हो सकता है।"
 
"Previous scholars, while describing the various types of Shanta-rasa, have said that Dhriti or Nirveda can also be the stable emotion of Shanta-rasa."
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)