श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 3: पश्चिमी विभाग: मुख्य भक्ति रस  »  लहर 1: शांत-रस (ईश्वर का शांत प्रेम)  »  श्लोक 49
 
 
श्लोक  3.1.49 
सर्वथैवम् अहङ्कार-रहितत्वं व्रजन्ति चेत् ।
अत्रान्तर्भावम् अर्हन्ति धर्म-वीरादयस् तदा ॥३.१.४९॥
 
 
अनुवाद
"जब धर्म, दान और दया में रत लोग (तपस्वीयों के अतिरिक्त) कर्तापन से पूर्णतया रहित हो जाते हैं, तब वे शान्तरस में प्रवेश करने के योग्य हो जाते हैं।"
 
"When those who are engaged in Dharma, charity and mercy (except ascetics) become completely devoid of doership, then they become capable of entering into the state of peace."
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)