श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 3: पश्चिमी विभाग: मुख्य भक्ति रस  »  लहर 1: शांत-रस (ईश्वर का शांत प्रेम)  »  श्लोक 36
 
 
श्लोक  3.1.36 
तत्र आद्या, यथा —
समाधौ योगिनस् तस्मिन्न् असम्प्रज्ञात-नामनि ।
लीलया मयि लब्धे’स्य बभूवोत्कम्पिनी तनुः ॥३.१.३६॥
 
 
अनुवाद
समा-शांत-रति: "जब मैंने असम्प्रज्ञात समाधि में लीन योगी के सामने खेल-खेल में स्वयं को प्रकट किया, तो उसका शरीर अत्यधिक कांपने लगा।"
 
Sama-śanta-rati: "When I playfully revealed Myself to the yogi absorbed in asamprajnata samadhi, his body trembled violently."
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)