श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 3: पश्चिमी विभाग: मुख्य भक्ति रस  »  लहर 1: शांत-रस (ईश्वर का शांत प्रेम)  »  श्लोक 23
 
 
श्लोक  3.1.23 
अथ पादाब्ज-तुलसी-गन्धो, यथा तृतीये (३.१५.४३) —
तस्यारविन्द-नयनस्य पदारविन्द-
किञ्जल्क-मिश्र-तुलसी-मकरन्द-वायुः ।
अन्तर्-गतः स्व-विवरेण चकार तेषां
सङ्क्षोभम् अक्षर-जुषाम् अपि चित्त-तन्वोः ॥३.१.२३॥
 
 
अनुवाद
तुलसी की सुगंध, श्रीमद्भागवतम् के तीसरे स्कंध [3.15.43] से: “जब भगवान के चरण कमलों के पंजों से तुलसी के पत्तों की सुगंध लेकर चलने वाली हवा उन ऋषियों के नथुनों में प्रवेश करती थी, तो उनके शरीर और मन दोनों में परिवर्तन होता था, भले ही वे निराकार ब्रह्म ज्ञान से जुड़े हुए थे।”
 
Fragrance of Tulsi, from the Third Canto of Srimad Bhagavatam [3.15.43]: “When the wind carrying the fragrance of Tulsi leaves from the toes of the Lord's lotus feet entered the nostrils of those sages, both their bodies and minds underwent transformation, even though they were connected with the knowledge of the formless Brahman.”
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)