अथ तापसाः —
भक्तिर् मुक्त्यैव निर्विघ्नेत्य् आत्त-युक्त-विरक्तताः ।
अनुज्झित-मुमुक्षा ये भजन्ते ते तु तापसाः ॥३.१.१५॥
अनुवाद
तपस-शांत-भक्त: "तपस्या करने वाले वे लोग हैं जो मोक्ष की इच्छा को त्यागे बिना युक्त-वैराग्य का अभ्यास करते हुए भगवान की पूजा करते हैं, क्योंकि मोक्ष प्राप्त करने से भक्ति में आने वाली बाधाएं नष्ट हो जाती हैं।"
tapas-śanta-bhakta: "The ascetics are those who worship the Lord while practicing yukta-vairagya without giving up the desire for liberation, because by attaining liberation the obstacles to devotion are destroyed."
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥