श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 2: दक्षिणी विभाग: सामान्य भक्ति रस  »  लहर 5: स्थायी-भाव (स्थायी आनंदवर्धक भाव)  »  श्लोक 81
 
 
श्लोक  2.5.81 
तद् अत्र सर्वथा साक्षात् कृष्णाद्य्-अनुभवाद्भुतः ।
प्रौढानन्द-चमत्कारो भक्तैः को’प्य् अनुरस्यते ॥२.५.८१॥
 
 
अनुवाद
"इस प्रकार उस रस के माध्यम से, भक्तगण कृष्ण और अन्य संबंधित चीजों की प्राप्ति से उत्पन्न एक आश्चर्यजनक, गहन आनंद का प्रत्यक्ष अनुभव करते हैं।"
 
"Thus through that rasa, devotees directly experience a wonderful, intense joy arising from the realization of Krishna and other related things."
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)