श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 2: दक्षिणी विभाग: सामान्य भक्ति रस  »  लहर 5: स्थायी-भाव (स्थायी आनंदवर्धक भाव)  »  श्लोक 72
 
 
श्लोक  2.5.72 
यथा —
यदवधि मम चेतः कृष्ण-पादारविन्दे
नव-नव-रस-धामन्य् उद्यतं रन्तुम् आसीत् ।
तदवधि बत नारी-सङ्गमे स्मर्यमाने
भवति मुख-विकारः सुष्ठु-निष्ठीवनं च ॥२.५.७२॥
 
 
अनुवाद
उदाहरण: "चूँकि मेरा हृदय कृष्ण के चरण कमलों में क्रीड़ा करने के लिए उत्सुक हो गया है, जो नित्य-ताजे रस के धाम हैं, इसलिए जब मैं स्त्रियों के साथ संबंध के बारे में सोचता हूँ, तो मेरा मुँह अरुचि से सिकुड़ जाता है और मैं थूक देता हूँ।"
 
Example: "Because my heart is eager to play at the lotus feet of Krishna, which are the abode of ever-fresh nectar, when I think of association with women, my mouth shrinks in disgust and I spit."
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)