श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 2: दक्षिणी विभाग: सामान्य भक्ति रस  »  लहर 5: स्थायी-भाव (स्थायी आनंदवर्धक भाव)  »  श्लोक 65
 
 
श्लोक  2.5.65 
अथ कृष्ण-विभावाः, यथा —
कण्ठ-सीमनि हरेर् द्युति-भाजं राधिका-मणि-सरं परिचित्य ।
तं चिरेण जटिला विकट-भ्रू- भङ्ग-भीमतर-दृष्टिर् ददर्श ॥२.५.६५॥
 
 
अनुवाद
कृष्ण द्वारा उत्तेजित क्रोध: "जब जटिला ने कृष्ण के गले में राधा की चमकती हुई मोतियों की माला को पहचाना, तो उसने भयंकर रूप से भौंहें चढ़ाईं और कृष्ण की ओर डरावनी दृष्टि से देखा।"
 
Anger provoked by Krishna: "When Jatila recognized Radha's shining pearl necklace around Krishna's neck, she frowned fiercely and looked at Krishna with horror."
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)