श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 2: दक्षिणी विभाग: सामान्य भक्ति रस  »  लहर 5: स्थायी-भाव (स्थायी आनंदवर्धक भाव)  »  श्लोक 63
 
 
श्लोक  2.5.63 
अथ क्रोध-रतिः —
प्रातिकूल्यादिभिश् चित्त-ज्वलनं क्रोध ईर्यते ।
पारुष्य-भ्रू-कुटी-नेत्र-लौहित्यादि-विकार-कृत् ॥२.५.६३॥
 
 
अनुवाद
क्रोध-रति: "विरोध का सामना करने से हृदय का भड़क उठना क्रोध कहलाता है। इस अवस्था में कठोर व्यवहार, भौंहें चढ़ना और आँखों का लाल होना प्रकट होता है।"
 
Krodha-rati: "The burning sensation in the heart when faced with opposition is called anger. This state is characterized by harsh behavior, raised eyebrows, and redness of the eyes."
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)