श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 2: दक्षिणी विभाग: सामान्य भक्ति रस  »  लहर 5: स्थायी-भाव (स्थायी आनंदवर्धक भाव)  »  श्लोक 62
 
 
श्लोक  2.5.62 
यथा वा —
अवलोक्य फणीन्द्र-यन्त्रितं
तनयं प्राण-सहस्र-वल्लभम् ।
हृदयं न विदीर्यति द्विधा
धिग् इमां मर्त्य-तनोः कठोरताम् ॥२.५.६२॥
 
 
अनुवाद
एक और उदाहरण: "हज़ार प्राणों से भी प्रिय कृष्ण को कालिया से बंधा देखकर मेरा हृदय नहीं टूटा। मेरा हृदय कितना कठोर है!"
 
Another example: "My heart did not break when I saw Krishna, dearer to me than a thousand lives, bound by Kaliya. How hard is my heart!"
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)