यथा मुकुन्द-मालायाम् (८)—
दिवि वा भुवि वा ममास्तु वासो
नरके वा नर्कान्तक प्रकामम् ।
अवधीरित-शारदारविन्दौ
चरणौ ते मरणे’पि चिन्तयामि ॥२.५.२९॥
अनुवाद
मुकुंद-माला [8] से एक उदाहरण: "हे राक्षस नरक के संहारक! मैं आपकी इच्छानुसार जहाँ भी रहूँगा - स्वर्ग में, पृथ्वी पर या नरक में - मैं आपके दो चरणों का स्मरण करूँगा, जिनकी सुंदरता मृत्यु के समय भी शरद ऋतु में खिलने वाले कमलों को मात देती है।"
An example from Mukunda-mala [8]: "O destroyer of the demon hell! Wherever I may be as you wish – in heaven, on earth or in hell – I will remember your two feet, whose beauty surpasses the lotuses blooming in autumn even at the time of death."