श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 2: दक्षिणी विभाग: सामान्य भक्ति रस  »  लहर 5: स्थायी-भाव (स्थायी आनंदवर्धक भाव)  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक  2.5.13 
यदा यादृशी भक्ते स्याद् आसक्तिस् तादृशं तदा ।
रूपं स्फटिकवद् धत्ते स्वच्छासौ तेन कीर्तिता ॥२.५.१३॥
 
 
अनुवाद
"जब भक्त की रति, स्पष्ट स्फटिक के समान, उस भक्त के समान हो जाती है, जिससे वह जुड़ा हुआ है, तो उसे स्वच्छ-रति कहा जाता है।"
 
"When the devotee's Rati, like clear crystal, becomes like that of the devotee to whom he is attached, it is called Svachha-Rati."
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)