श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 2: दक्षिणी विभाग: सामान्य भक्ति रस  »  लहर 5: स्थायी-भाव (स्थायी आनंदवर्धक भाव)  »  श्लोक 121
 
 
श्लोक  2.5.121 
पूर्तिः शान्ते विकाशस् तु प्रीतादिष्व् अपि पञ्चसु ।
वीरे’द्भुते च विस्तारो विक्षेपः करुणोग्रयोः ।
भयानके’थ बीभत्से क्षोभो धीरैर् उदाहृतः ॥२.५.१२१॥
 
 
अनुवाद
"विद्वान कहते हैं कि पूर्ति (संतुष्टि) शांत-रस में प्रकट होती है, विकास (उज्ज्वलता) प्रीति से हास्य तक सभी रसों में प्रकट होती है, विस्तार (विस्तार) वीर-रस और अद्भुत-रस में प्रकट होता है, विक्षेप (व्याकुलता) करुणा-रस और रौद्र-रस में प्रकट होता है, और क्षोभ (विक्षोभ) भयानक-रस और बीभत्स-रस में प्रकट होता है।"
 
"Scholars say that purti (satisfaction) appears in shanta-rasa, vikas (brightness) appears in all rasas from preeti to hasya, vistar (expansion) appears in veera-rasa and adbhuta-rasa, vikshep (distraction) appears in karuna-rasa and raudra-rasa, and kshobha (disturbance) appears in bhayanak-rasa and bibhatsa-rasa."
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)