श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 2: दक्षिणी विभाग: सामान्य भक्ति रस  »  लहर 5: स्थायी-भाव (स्थायी आनंदवर्धक भाव)  »  श्लोक 111
 
 
श्लोक  2.5.111 
यत्-सुखौघ-लवागस्त्यः पिबत्य् एव स्व-तेजसा ।
रेमश-माधुरी-साक्षात्कारानन्दाब्धिम् अप्य् अलम् ॥२.५.१११॥
 
 
अनुवाद
"ब्रज कृष्ण के इस आनंद की एक बूंद, अपनी शक्ति से, रुक्मिणी के पति में निहित आनंद के सागर को पी जाती है, जैसे अगस्त्य मुनि ने देवताओं की सहायता के लिए समुद्र को पी लिया था।"
 
"A single drop of this bliss of Vraja Krishna, by its power, drinks up the ocean of bliss contained in Rukmini's husband, just as sage Agastya drank up the ocean to help the gods."
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)