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श्री भक्ति रसामृत सिंधु
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सागर 2: दक्षिणी विभाग: सामान्य भक्ति रस
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लहर 5: स्थायी-भाव (स्थायी आनंदवर्धक भाव)
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श्लोक 105
श्लोक
2.5.105
पराश्रयतयाप्य् एते जातु भान्तः सुखादयः ।
हृदये परमानन्द-सन्दोहम् उपचिन्वते ॥२.५.१०५॥
अनुवाद
"ऐसा इसलिए है क्योंकि जब भक्त दूसरों के सुख को देखता है, तो उसके हृदय में अतुलनीय आनंद उत्पन्न होता है।"
“This is because when a devotee sees the happiness of others, incomparable joy arises in his heart.”
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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