श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 2: दक्षिणी विभाग: सामान्य भक्ति रस  »  लहर 5: स्थायी-भाव (स्थायी आनंदवर्धक भाव)  »  श्लोक 103
 
 
श्लोक  2.5.103 
तद् उक्तं श्री-भरतेन —
शक्तिर् अस्ति विभावादेः कापि साधारणी-कृतौ ।
प्रमाता तद्-अभेदेन स्वं यया प्रतिपद्यते ॥२.५.१०३॥
 
 
अनुवाद
भरत मुनि ने कहा है: "पहचान के मामले में, विभाव और अन्य तत्वों में एक अवर्णनीय शक्ति है, जिसके द्वारा दर्शक मंच पर चित्रित पात्रों से भिन्न नहीं हो जाते हैं।"
 
Bharata Muni has said: "In the matter of identification, the vibhavas and other elements have an indescribable power by which the spectators become indistinguishable from the characters portrayed on the stage."
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)