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श्री भक्ति रसामृत सिंधु
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श्लोक 85
श्लोक
2.4.85
अधिरूढे महा-भावे मोहनत्वम् उपागते ।
अवस्थान्तरम् आप्तो’सौ दिव्योन्माद इतीर्यते ॥२.४.८५॥
अनुवाद
“जब कोई व्यक्ति महाभाव के अधिरूढ़ चरण में मोह की अवस्था को प्राप्त करता है, तो उन्माद एक अन्य रूप धारण कर लेता है जिसे दिव्योन्माद कहते हैं।”
“When a person attains the state of delusion in the superconscious state of Mahabhava, madness takes another form called divine madness.”
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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