श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 2: दक्षिणी विभाग: सामान्य भक्ति रस  »  लहर 4: व्याभिचारी-भाव (क्षणिक आनंदवर्धक अस्थिरताएँ)  »  श्लोक 85
 
 
श्लोक  2.4.85 
अधिरूढे महा-भावे मोहनत्वम् उपागते ।
अवस्थान्तरम् आप्तो’सौ दिव्योन्माद इतीर्यते ॥२.४.८५॥
 
 
अनुवाद
“जब कोई व्यक्ति महाभाव के अधिरूढ़ चरण में मोह की अवस्था को प्राप्त करता है, तो उन्माद एक अन्य रूप धारण कर लेता है जिसे दिव्योन्माद कहते हैं।”
 
“When a person attains the state of delusion in the superconscious state of Mahabhava, madness takes another form called divine madness.”
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