श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 2: दक्षिणी विभाग: सामान्य भक्ति रस  »  लहर 4: व्याभिचारी-भाव (क्षणिक आनंदवर्धक अस्थिरताएँ)  »  श्लोक 58
 
 
श्लोक  2.4.58 
गात्रोत्कम्पी मनः-कम्पः सहसा त्रास उच्यते ।
पूर्वापर-विचारोत्थं भयं त्रासात् पृथग् भवेत् ॥२.४.५८॥
 
 
अनुवाद
"हृदय की वह गड़बड़ी जिसके कारण अचानक अंग काँपने लगते हैं, त्रास कहलाती है। यह भय से भिन्न है। भय पिछली और बाद की घटनाओं पर विचार करने के बाद उत्पन्न होता है।"
 
"The disturbance of the heart which causes the limbs to tremble suddenly is called terror. It is different from fear. Fear arises after considering past and future events."
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)