श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 2: दक्षिणी विभाग: सामान्य भक्ति रस  »  लहर 4: व्याभिचारी-भाव (क्षणिक आनंदवर्धक अस्थिरताएँ)  »  श्लोक 264
 
 
श्लोक  2.4.264 
अत्यन्त-कठिनं वज्रम् अकुतश्चन मार्दवम् ।
ईदृशं तापसादीनां चित्तं तावद् अवेक्ष्यते ॥२.४.२६४॥
 
 
अनुवाद
"वज्र अत्यंत कठोर है और कभी कोमल नहीं होता। यह कठोरता कठोर तपस्या करने वालों के हृदय में देखी जाती है।"
 
"The thunderbolt is extremely hard and never becomes soft. This hardness is seen in the hearts of those who practice severe penance."
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)