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श्लोक 212
श्लोक
2.4.212
निर्वेदः क्रोध-वश्यत्वाद् अयं व्यवहितो रतेः ॥२.४.२१२॥
अनुवाद
"उपर्युक्त श्लोक में, निर्वेद (आत्म-निंदा) क्रोध की गौण रति के अधीन है। इसलिए इसे अप्रत्यक्ष (व्यवहित) कहा गया है।"
"In the above verse, Nirveda (self-reproach) is subordinated to the secondary passion of anger. Therefore it is called indirect (vyavahita)."
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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