श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 2: दक्षिणी विभाग: सामान्य भक्ति रस  »  लहर 3: सात्त्विक-भाव (अस्वेच्छित आनंदवर्धक अभिव्यंजनाएँ)  »  श्लोक 85
 
 
श्लोक  2.3.85 
यथा —
वाराणसी-निवासी कश्चिद् अयं व्याहरन् हरेश् चरितम् ।
यति-गोष्ठ्याम् उत्पुलकः सिञ्चति गण्ड-द्वयीम् अस्रैः ॥२.३.८५॥
 
 
अनुवाद
उदाहरण: "जब वाराणसी में रहने वाले एक व्यक्ति ने संन्यासियों की सभा में बार-बार हरि के गुणों का गुणगान किया, तो उसके रोंगटे खड़े हो गए और उसके गालों से आँसू बहने लगे।"
 
Example: "When a man living in Varanasi repeatedly sang the praises of Hari in the assembly of ascetics, his hair stood on end and tears started flowing down his cheeks."
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)