श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 2: दक्षिणी विभाग: सामान्य भक्ति रस  »  लहर 3: सात्त्विक-भाव (अस्वेच्छित आनंदवर्धक अभिव्यंजनाएँ)  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  2.3.12 
रुक्षाः —
मधुराश्चर्य-तद्-वार्तोत्पन्नैर् मुद्-विस्मयादिभिः ।
जाता भक्तोपमे रुक्षा रति-शून्ये जने क्वचित् ॥२.३.१२॥
 
 
अनुवाद
रुक्ष-सात्त्विक भाव: "कभी-कभी रति से युक्त व्यक्तियों के समान प्रत्यक्ष सात्त्विक भाव, मधुर एवं विस्मयकारी भगवान के विषय में श्रवण से उत्पन्न विस्मय या आनंद के कारण, रतिविहीन व्यक्तियों में भी प्रकट होते हैं। इसे रुक्ष-सात्त्विक भाव कहते हैं।"
 
Ruksha-Sattvik Bhaav: "Sometimes, Sattvik Bhaav, like that of those with Rati, manifests itself even in those without Rati, due to the wonder or joy arising from hearing about the sweet and wonderful Lord. This is called Ruksha-Sattvik Bhaav."
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