श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 2: दक्षिणी विभाग: सामान्य भक्ति रस  »  लहर 1: विभाव (आनंदवर्धक अवस्थाएँ)  »  श्लोक 84
 
 
श्लोक  2.1.84 
(१४) विदग्धः —
कला-विलास-दिग्धात्मा विदग्ध इति कीर्त्यते ॥२.१.८४॥॥
 
 
अनुवाद
(14) विदग्धाः सौन्दर्यप्रिय - "जिसका मन नृत्य, गायन आदि 64 कलाओं तथा विविध मनोरंजनों में लीन रहता है, उसे सौन्दर्यप्रिय कहते हैं।"
 
(14) Vidagdhah Saundaryapriya - "He whose mind is absorbed in the 64 arts and various entertainments like dancing, singing etc. is called Saundaryapriya."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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