श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 2: दक्षिणी विभाग: सामान्य भक्ति रस  »  लहर 1: विभाव (आनंदवर्धक अवस्थाएँ)  »  श्लोक 81
 
 
श्लोक  2.1.81 
सूक्ष्म-धीः, यथा —
यदुभिर् अयम् अवध्यो म्लेच्छ-राजस् तद्
एनं तरल-तमसि तस्मिन् विद्रवन्न् एव नेष्ये ।
सुखमय-निज-निद्रा-भञ्जन-ध्वंसि-दृष्टिर्
झर-मुचि मुचुकुन्दः कन्दरे यत्र शेते ॥२.१.८१॥
 
 
अनुवाद
उत्तम बुद्धि का एक उदाहरण: "यह कालयवन यदुओं द्वारा नहीं मारा जा सकता। मैं इसे मंद प्रकाश वाली गुफा में भागकर वहाँ ले आऊँगा। झरनों से सुसज्जित उस गुफा में मुचुकुन्द सो रहे हैं। जब कालयवन द्वारा आरामदायक नींद से बेरहमी से जगाए जाने पर मुचुकुन्द अपनी आँखें खोलेंगे, तो वे अपनी दृष्टि से इस शत्रु का नाश कर देंगे।"
 
An example of excellent wisdom: "This Kalayavana cannot be killed by the Yadus. I will run to a dimly lit cave and bring him there. Muchukunda is sleeping in that cave, adorned with waterfalls. When Muchukunda opens his eyes after being rudely awakened from his comfortable sleep by Kalayavana, he will destroy this enemy with his sight."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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