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श्लोक 2.1.75  |
(११) सुपण्डित्यः —
विद्वान् नीतिज्ञ इत्य् एष सुपण्डित्यो द्विधा मतः ।
विद्वान् अखिल-विद्या-विन् नीतिज्ञस् तु यथार्ह-कृत् ॥२.१.७५॥॥ |
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| अनुवाद |
| (11) सुपण्डित्यः: ज्ञानी - "ज्ञानी होने के दो पहलू हैं: सभी विषयों की सभी शाखाओं का ज्ञान, और उचित आचरण का ज्ञान।" |
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| (11) Supandityah: Jnani – “There are two aspects of being a Jnani: knowledge of all branches of all subjects, and knowledge of proper conduct.” |
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