श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 2: दक्षिणी विभाग: सामान्य भक्ति रस  »  लहर 1: विभाव (आनंदवर्धक अवस्थाएँ)  »  श्लोक 71
 
 
श्लोक  2.1.71 
यथा —
कृत-व्यलीके’पि न कुण्डलीन्द्र
त्वया विधेया मयि दोष-दृष्टिः ।
प्रवास्यमानो’सि सुरार्चितानां
परं हितायाद्य गवां कुलस्य ॥२.१.७१॥
 
 
अनुवाद
"हे सर्पराज! यद्यपि मैंने तुम्हें कष्ट दिया है, फिर भी तुम मुझमें दोष मत ढूंढ़ो। देवताओं द्वारा भी पूजनीय गौओं के हित के लिए तुम्हें यहाँ से दूर रहना चाहिए।"
 
"O King of Serpents! Although I have caused you pain, do not find fault with me. For the sake of the cows, who are worshipped even by the gods, you should stay away from here."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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