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श्लोक 2.1.68  |
यथा —
पृथे तनय-पञ्चकं प्रकटम् अर्पयिष्यामि ते
रणोर्वरितम् इत्य् अभूत् तव यथार्थम् एवोदितम् ।
रविर् भवति शीतलः कुमुद-बन्धुर् अप्य् उष्णलस्
तथापि न मुरान्तक व्यभिचरिष्णुर् उक्तिस् तव ॥२.१.६८॥ |
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| अनुवाद |
| "तुमने कहा था, 'हे कुन्ती! मैं तुम्हारे पाँचों पुत्रों को युद्धभूमि से जीवित और बड़े सम्मान के साथ तुम्हारे पास वापस लाऊँगा।' तुम्हारा कथन सत्य हो गया। हे मुरारी! चाहे सूर्य शीतल हो जाए और चंद्रमा गर्म हो जाए, फिर भी तुम्हारे वचन कभी असत्य नहीं होंगे।" |
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| "You said, 'O Kunti! I will bring back to you your five sons alive from the battlefield and with great honor.' Your words have come true. O Murari! Even if the sun cools and the moon heats up, your words will never be false." |
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