श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 2: दक्षिणी विभाग: सामान्य भक्ति रस  »  लहर 1: विभाव (आनंदवर्धक अवस्थाएँ)  »  श्लोक 66
 
 
श्लोक  2.1.66 
यथा —
व्रज-युवतिषु शौरिः शौरसेनीं सुरेन्द्रे
प्रणत-शिरसि सौरीं भारतीम् आतनोति ।
अहह पशुषु कीरेष्व् अप्य् अपभ्रंस-रूपां
कथम् अजनि विदग्धः सर्व-भाषावलीषु ॥२.१.६६॥
 
 
अनुवाद
"शौरी कृष्ण व्रज की युवा गोपियों के समक्ष लोकभाषा में, आदरणीय इंद्र के समक्ष संस्कृत में, पशुओं, कश्मीर के लोगों और तोतों के समक्ष बोलचाल की भाषा में अपने को अभिव्यक्त करते हैं। यह कितना अद्भुत है! वे इन सभी भाषाओं में पारंगत कैसे हो गए?"
 
"Shāuri Kṛṣṇa expresses himself in the vernacular language before the young gopīs of Vraja, in Sanskrit before the venerable Indra, and in the spoken language before the animals, the people of Kashmir, and the parrots. How amazing! How did he become proficient in all these languages?"
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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