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श्लोक 2.1.6  |
प्राक्तन्य् आधुनिकी चास्ति यस्य सद्-भक्ति-वासना ।
एष भक्ति-रसास्वादस् तस्यैव हृदि जायते ॥२.१.६॥ |
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| अनुवाद |
| भक्ति-रस का स्वाद उस व्यक्ति के हृदय में उत्पन्न होता है, जिसने पिछले और वर्तमान जीवन में शुद्ध भक्ति का अनुभव किया हो। |
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| The taste of bhakti-rasa arises in the heart of a person who has experienced pure devotion in his past and present life. |
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