श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 2: दक्षिणी विभाग: सामान्य भक्ति रस  »  लहर 1: विभाव (आनंदवर्धक अवस्थाएँ)  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  2.1.6 
प्राक्तन्य् आधुनिकी चास्ति यस्य सद्-भक्ति-वासना ।
एष भक्ति-रसास्वादस् तस्यैव हृदि जायते ॥२.१.६॥
 
 
अनुवाद
भक्ति-रस का स्वाद उस व्यक्ति के हृदय में उत्पन्न होता है, जिसने पिछले और वर्तमान जीवन में शुद्ध भक्ति का अनुभव किया हो।
 
The taste of bhakti-rasa arises in the heart of a person who has experienced pure devotion in his past and present life.
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas