श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 2: दक्षिणी विभाग: सामान्य भक्ति रस  »  लहर 1: विभाव (आनंदवर्धक अवस्थाएँ)  »  श्लोक 59
 
 
श्लोक  2.1.59 
यथा —
दूरतस् तम् अवलोक्य माधवं कोमलाङ्गम् अपि रङ्ग-मण्डले ।
पर्वतोद्भट-भुजान्तरो’प्य् असौ
कंस-मल्ल-निवहः स विव्यथे ॥२.१.५९॥
 
 
अनुवाद
“माधव को दूर से उनके कोमल शरीर सहित देखकर, अखाड़े में पहलवानों का समूह, यद्यपि पर्वतों से भी बड़ी छाती वाला था, भय से व्याकुल हो गया।”
 
“Seeing Madhava from a distance with his soft body, the group of wrestlers in the arena, though with chests bigger than mountains, were overcome with fear.”
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)