श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 2: दक्षिणी विभाग: सामान्य भक्ति रस  »  लहर 1: विभाव (आनंदवर्धक अवस्थाएँ)  »  श्लोक 57
 
 
श्लोक  2.1.57 
यथा —
अम्बर-मणि-निकुरम्बं विडम्बयन्न् अपि मरीचि-कुलैः ।
हरि-वक्षसि रुचि-निविडे मणिराड् अयम् उडुर् इव स्फुरति ॥२.१.५७॥
 
 
अनुवाद
"यद्यपि रत्नों का राजा कौस्तुभ मणि अपनी चमकती किरणों से सूर्य को भी धिक्कारती है, फिर भी वह भगवान के वक्षस्थल पर स्थित एक तारे के समान प्रतीत होती है, जो उससे कहीं अधिक चमकती है।"
 
"Although the Kaustubha gem, the king of gems, outshines even the sun with its shining rays, it appears like a star situated on the chest of the Lord, shining much brighter than it."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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