श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 2: दक्षिणी विभाग: सामान्य भक्ति रस  »  लहर 1: विभाव (आनंदवर्धक अवस्थाएँ)  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  2.1.5 
विभावैर् अनुभावैश् च सात्त्विकैर् व्यभिचारिभिः ।
स्वाद्यत्वं हृदि भक्तानाम् आनीता श्रवणादिभिः ।
एषा कृष्ण-रतिः स्थायी भावो भक्ति-रसो भवेत् ॥२.१.५॥
 
 
अनुवाद
"कृष्ण के लिए यह रति, जिसे स्थाई भाव कहा जाता है, भक्तों के हृदय में विभाव, अनुभव, सात्विक भाव और व्यवहार भाव द्वारा श्रवण आदि क्रियाओं के माध्यम से सुखद स्वरूप ग्रहण कर लेती है और फिर भक्ति रस बन जाती है।"
 
"This love for Krishna, which is called Sthayi Bhaav, takes on a pleasant form in the hearts of the devotees through Vibhaav, Anubhaav, Satvik Bhaav and Vyavahara Bhaav through actions like Shravan etc. and then becomes Bhakti Rasa."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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