श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 2: दक्षिणी विभाग: सामान्य भक्ति रस  »  लहर 1: विभाव (आनंदवर्धक अवस्थाएँ)  »  श्लोक 48
 
 
श्लोक  2.1.48 
तत्र गुणोत्थम् —
गुणोत्थं स्याद् गुणैर् योगो रक्तता-तुङ्गतादिभिः ॥२.१.४८॥
 
 
अनुवाद
“गुणोत्तम का तात्पर्य किसी अंग की लालिमा या ऊंचाई जैसे गुणों से है।”
 
“Gunanottam refers to the qualities like redness or height of an organ.”
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)