श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 2: दक्षिणी विभाग: सामान्य भक्ति रस  »  लहर 1: विभाव (आनंदवर्धक अवस्थाएँ)  »  श्लोक 373
 
 
श्लोक  2.1.373 
अथ शृङ्गम् —
शृङ्गं तु गवलं हेम-निबद्धाग्रिम-पश्चिमम् ।
रत्न-जाल-स्फुरन्-मध्यं मन्द्र-घोषाभिधं स्मृतम् ॥२.१.३७३॥
 
 
अनुवाद
सींग: "जंगली भैंसे का सींग जिसके दोनों सिरों पर सोना चढ़ा होता है और बीच में रत्न जड़े होते हैं, उसे मंदराघोष (गड़गड़ाहट) कहा जाता है।"
 
Horn: "The horn of the wild buffalo with gold plated on both ends and gems embedded in the middle is called Mandraghosha (thunder)."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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