श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 2: दक्षिणी विभाग: सामान्य भक्ति रस  »  लहर 1: विभाव (आनंदवर्धक अवस्थाएँ)  »  श्लोक 370-371
 
 
श्लोक  2.1.370-371 
दशाङ्गुलान्तरा स्याच् चेत् सा तार-मुख-रन्ध्रयोः ।
महानन्देति व्याख्याता तथा संमोहिनीति च ॥२.१.३७०॥
भवेत् सूर्यान्तरा सा चेत् तत आकर्षिणी मता ।
आनन्दिनी तदा वंशी भवेद् इन्द्रान्तरा यदि ॥२.१.३७१॥
 
 
अनुवाद
"जब मुख छिद्र और स्वरों के लिए प्रथम छिद्र के बीच की जगह दस अंगुल की हो, तो वंशी को महानन्दा (परम आनन्द) और सम्मोहिनी (मोहिनी) कहा जाता है। यदि जगह बारह अंगुल की हो, तो वंशी को आकर्षिणी (आकर्षित करने वाली) कहा जाता है। यदि जगह चौदह अंगुल की हो, तो वंशी को आनंदिनी (आनंद देने वाली) कहा जाता है।"
 
"When the space between the mouth and the first hole for the notes is ten inches, the flute is called Mahanand (supreme bliss) and Sammohini (enchanter). If the space is twelve inches, the flute is called Akarshini (attracting). If the space is fourteen inches, the flute is called Anandini (bliss-giving)."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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