श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 2: दक्षिणी विभाग: सामान्य भक्ति रस  »  लहर 1: विभाव (आनंदवर्धक अवस्थाएँ)  »  श्लोक 341
 
 
श्लोक  2.1.341 
यथा —
अहह नवाम्बुद-कान्तेर् अमुष्य सुकुमारता कुमारस्य ।
अपि नव-पल्लव-सङ्गाद् अङ्गान्य् अपरज्य शीर्यन्ति ॥२.१.३४१॥
 
 
अनुवाद
"आह! इस बालक का शरीर इतना कोमल है, जिसका रंग नये मेघ के समान है कि नये अंकुरों को छूते ही उसके अंग चोटिल और फट जाते हैं।"
 
"Ah! so tender is this child's body, whose color is like that of a new cloud, that his limbs are bruised and torn by the touch of the new shoots."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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