श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 2: दक्षिणी विभाग: सामान्य भक्ति रस  »  लहर 1: विभाव (आनंदवर्धक अवस्थाएँ)  »  श्लोक 329
 
 
श्लोक  2.1.329 
तन्-माधुर्यं, यथा —
दशार्ध-शर-माधुरी-दमन-दक्षयाङ्ग-श्रिया
विधूनित-वधू-धृतिं वरकला-विलासास्पदम् ।
दृग्-अञ्चल-चमत्कृति-क्षपित-खञ्जरीट-द्युतिं
स्फुरत्-तरुणिमोद्गमं तरुणि पश्य पीताम्बरम् ॥२.१.३२९॥
 
 
अनुवाद
युवावस्था के अंतिम काल की मधुरता: "हे युवती! उस पुरुष को देखो जो पीले वस्त्र पहने हुए है और नवीन यौवन की शोभा बिखेर रहा है। कामदेव के पाँच बाणों को विफल करने में सक्षम अपने शारीरिक सौंदर्य से वह स्त्रियों का सारा संयम भंग कर देता है। वह चौंसठ कलाओं का क्रीड़ा-स्थल है और उसके नेत्रों के अग्रभागों का अद्भुत सौंदर्य बगुला के तेज को चूर-चूर कर देता है।"
 
The Sweetness of the Last Period of Youth: "O young woman! Behold the man dressed in yellow, radiating the splendor of youth. With his physical beauty, capable of warding off the five arrows of Cupid, he shatters all restraint in women. He is the playground of the sixty-four arts, and the wondrous beauty of his eye-brows shatters the brilliance of the heron."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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