श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 2: दक्षिणी विभाग: सामान्य भक्ति रस  »  लहर 1: विभाव (आनंदवर्धक अवस्थाएँ)  »  श्लोक 325
 
 
श्लोक  2.1.325 
यथा —
व्यक्तालक्त-पदैः क्वचित् परिलुठत्-पिञ्छावतंसैः क्वचित्
तल्पैर् विच्युत-काञ्चिभिः क्वचिद् असौ व्याकीर्ण-कुञ्जोत्करा ।
प्रोद्यन्-मण्डल-बन्ध-ताण्डव-घटालक्ष्मोल्लसत्-सैकता
गोविन्दस्य विलास-वृन्दम् अधिकं वृन्दाटवी शंसति ॥२.१.३२५॥
 
 
अनुवाद
उदाहरण: "कहीं तो उनके स्पष्ट रूप से दिखाई देने वाले लाख से सने पैरों के निशानों से, कहीं उनके मुकुट से लूटे गए मोर पंखों से, कहीं त्यागे गए करधनी से बिछे हुए बिस्तरों से, कहीं बिखरे हुए वृक्षों और वृत्ताकार नृत्य के स्पष्ट चिह्नों से चमकती रेत से - वृंदावन गोविंद की विविध लीलाओं की घोषणा करता है।"
 
Example: "Somewhere with his clearly visible lacquered footprints, somewhere with peacock feathers plucked from his crown, somewhere with beds strewn with discarded girdles, somewhere with scattered trees and sand shining with clear marks of circular dance - Vrindavan proclaims the varied pastimes of Govinda."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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