श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 2: दक्षिणी विभाग: सामान्य भक्ति रस  »  लहर 1: विभाव (आनंदवर्धक अवस्थाएँ)  »  श्लोक 324
 
 
श्लोक  2.1.324 
वैदग्धी-सार-विस्तारः कुञ्ज-केलि-महोत्सवः ।
आरम्भो रास-लीलादेर् इह चेष्टादि-सौष्ठवम् ॥२.१.३२४॥
 
 
अनुवाद
"युवावस्था के मध्यकाल में उनके आचरण की उत्कृष्टता में आकर्षक किन्तु चतुराईपूर्ण कार्यों का प्रचुर संकेन्द्रण, वनों में लीलाओं का महान उत्सव तथा रास नृत्य का आरम्भ सम्मिलित है।"
 
"The excellence of his conduct in the middle period of his youth includes a rich concentration of attractive yet clever actions, great celebrations of pastimes in the forests and the beginning of the Rasa dance."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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