श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 2: दक्षिणी विभाग: सामान्य भक्ति रस  »  लहर 1: विभाव (आनंदवर्धक अवस्थाएँ)  »  श्लोक 322
 
 
श्लोक  2.1.322 
मुखं स्मित-विलासाढ्यं विभ्रमोत्तरले दृशौ ।
त्रि-जगन्-मोहनं गीतम् इत्य् आदिर् इह माधुरी ॥२.१.३२२॥
 
 
अनुवाद
"उनके मध्य युवावस्था की मधुरता में उनका कोमल मुस्कान से चमकता चेहरा, उनकी चंचल आंखें और उनका गायन शामिल है जो तीन शब्दों को मंत्रमुग्ध कर देता है।"
 
"The sweetness of her middle youth includes her face shining with a gentle smile, her playful eyes and her singing that spells three words."
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)