श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 2: दक्षिणी विभाग: सामान्य भक्ति रस  »  लहर 1: विभाव (आनंदवर्धक अवस्थाएँ)  »  श्लोक 319
 
 
श्लोक  2.1.319 
तन्-मोहनता, यथा —
कर्तुं मुग्धाः स्वयम् अचटुना न क्षमन्ते’भियोगं
न व्यादातुं क्वचिद् अपि जने वक्त्रम् अप्य् उत्सहन्ते ।
दृष्ट्वा तास् ते नव-मधुरिम-स्मेरतां माधवार्ताः
स्व-प्राणेभ्यस् त्रयम् उदसृजन्न् अद्य तोयाञ्जलीनाम् ॥२.१.३१९॥
 
 
अनुवाद
युवावस्था के प्रथम भाग का आकर्षण: "हे माधव! आपकी मुस्कान की नवीन मधुरता को निहारकर, मोहग्रस्त, स्थिर गोपियाँ अपने मन के भावों को सहज रूप से प्रकट नहीं कर पा रही हैं। वे किसी पर भी विश्वास नहीं कर पा रही हैं। इससे अधिक और क्या कहा जा सकता है? वे इतनी व्यथित हैं कि आज उन्होंने अपनी प्राणवायु को तीन चुल्लू जल अर्पित कर दिया है।"
 
The Charm of the First Part of Youth: "O Madhava! Beholding the new sweetness of your smile, the captivated, still Gopis are unable to express their feelings easily. They are unable to trust anyone. What more can be said? They are so distressed that today they have offered three handfuls of water to their life-giving breath."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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