श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 2: दक्षिणी विभाग: सामान्य भक्ति रस  »  लहर 1: विभाव (आनंदवर्धक अवस्थाएँ)  »  श्लोक 318
 
 
श्लोक  2.1.318 
यथा—
नवं धनुर् इवातनोर् नटद्-अघ-द्विषोर् भ्रू-युगं
शरालिर् इव शाणिता नखर-राजिर् अग्रे खरा ।
विराजति शरीरिणी रुचिर-दन्त-लेखारुणा
न का सखि समीक्षणाद् युवतिर् अस्य वित्रस्यति ॥२.१.३१८॥
 
 
अनुवाद
एक उदाहरण: "अघ के शत्रु की दोनों भौहें कामदेव के नए धनुषों की तरह नाच रही हैं। उनके नखों की पंक्तियों के सिरे इतने तीखे हैं कि वे बाणों की पंक्ति की तरह चमकते हैं। उनके आकर्षक दांतों की चमकती पंक्तियाँ भोर की लालिमा का प्रतीक हैं। कौन युवती उन्हें देखकर भयभीत नहीं होगी?"
 
An example: "The two eyebrows of the enemy of Agh dance like Cupid's new bows. The tips of his nails are so sharp that they shine like rows of arrows. The shining rows of his charming teeth symbolize the redness of dawn. What young woman would not be frightened by seeing him?"
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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