श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 2: दक्षिणी विभाग: सामान्य भक्ति रस  »  लहर 1: विभाव (आनंदवर्धक अवस्थाएँ)  »  श्लोक 301-302
 
 
श्लोक  2.1.301-302 
अथ उद्दीपनाः —
उद्दीपनास् तु ते प्रोक्ता भावम् उद्दीपयन्ति ये ।
ते तु श्री-कृष्ण-चन्द्रस्य गुणाश् चेष्टाः प्रसाधनम् ॥२.१.३०१॥
स्मिताङ्ग-सौरभे वंश-शृङ्ग-नूपुर-कम्बवः ।
पदाङ्क-क्षेत्र-तुलसी-भक्त-तद्-वासरादयः ॥२.१.३०२॥
 
 
अनुवाद
"वे वस्तुएँ जो साधक के भाव को पोषित करती हैं, उद्दीपन या उत्तेजनाएँ कहलाती हैं। ये वस्तुएँ हैं जैसे कृष्ण के गुण, लीलाएँ, अलंकरण, उनकी मुस्कान, उनके शरीर की सुगंध, उनकी बाँसुरी, नूपुर, शंख, पदचिह्न, उनका धाम, तुलसी, भक्त और जन्माष्टमी व एकादशी जैसे त्यौहार।"
 
"Things that nourish the devotee's bhaav are called uddipana or stimuli. These are things like Krishna's qualities, pastimes, ornaments, his smile, the fragrance of his body, his flute, anklets, conch, footprints, his abode, Tulsi, devotees, and festivals like Janmashtami and Ekadashi."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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