श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 2: दक्षिणी विभाग: सामान्य भक्ति रस  »  लहर 1: विभाव (आनंदवर्धक अवस्थाएँ)  »  श्लोक 295
 
 
श्लोक  2.1.295 
सनातनं मित्रम् इति तस्याप्य् औत्पत्तिकः कथम् ।
स्नेहो’स्मास्व् इति चैतेषां नित्य-प्रेष्ठत्वम् आगतम् ॥२.१.२९५॥
 
 
अनुवाद
“श्लोक 293 में ‘शाश्वत मित्र’ और श्लोक 294 में ‘ऐसा कैसे है कि वे हमारी ओर सहज रूप से आकर्षित होते हैं?’ से हम समझ सकते हैं कि व्रजवासी भगवान के शाश्वत सहयोगी हैं।”
 
“From the words ‘eternal friend’ in verse 293 and ‘how is it that they are naturally attracted to us?’ in verse 294, we can understand that the residents of Vraja are the eternal associates of the Lord.”
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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