श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 2: दक्षिणी विभाग: सामान्य भक्ति रस  »  लहर 1: विभाव (आनंदवर्धक अवस्थाएँ)  »  श्लोक 29
 
 
श्लोक  2.1.29 
वरीयान् ईश्वरश् चेति गुणास् तस्यानुकीर्तिताः ।
समुद्रा इव पञ्चाशद् दुर्विगाहा हरेर् अमी ॥२.१.२९॥
 
 
अनुवाद
"वे सबसे महत्वपूर्ण और नियन्ता हैं। कृष्ण के ये पचास गुण जो सूचीबद्ध किए गए हैं, समुद्र की तरह बूझना कठिन है।"
 
"He is the most important and the controller. These fifty qualities of Krishna that have been listed are as difficult to comprehend as the ocean."
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)