| श्री भक्ति रसामृत सिंधु » सागर 2: दक्षिणी विभाग: सामान्य भक्ति रस » लहर 1: विभाव (आनंदवर्धक अवस्थाएँ) » श्लोक 280 |
|
| | | | श्लोक 2.1.280  | अथ सिद्धाः—
अविज्ञाताखिल-क्लेशाः सदा कृष्णाश्रित-क्रियाः ।
सिद्धाः स्युः सन्तत-प्रेम-सौख्यास्वाद-परायणाः ॥२.१.२८०॥ | | | | | | अनुवाद | | "जो लोग किसी भी प्रकार का दुःख अनुभव नहीं करते, जो कृष्ण की शरण में रहकर सभी कर्म करते हैं, तथा जो सदैव निरंतर प्रेम का सुख भोगते हैं, वे सिद्ध भक्त कहलाते हैं।" | | | | "Those who do not experience any kind of sorrow, who perform all actions while taking shelter of Krishna, and who always enjoy the happiness of constant love, are called perfect devotees." | |
| | ✨ ai-generated | | |
|
|