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श्री भक्ति रसामृत सिंधु
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सागर 2: दक्षिणी विभाग: सामान्य भक्ति रस
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लहर 1: विभाव (आनंदवर्धक अवस्थाएँ)
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श्लोक 27
श्लोक
2.1.27
दक्षिणो विनयी ह्रीमान् शरणागत-पालकः ।
सुखी भक्त-सुहृत् प्रेम-वश्यः सर्व-शुभङ्करः ॥२.१.२७॥
अनुवाद
"वे आज्ञाकारी, विनीत, लज्जाशील, शरणागतों के रक्षक, प्रसन्न, भक्तों के मित्र, प्रेम से वश में रहने वाले तथा सबका कल्याण करने वाले हैं।"
"He is obedient, humble, modest, protector of those who seek refuge, happy, friend of devotees, controlled by love and does good to all."
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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