श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 2: दक्षिणी विभाग: सामान्य भक्ति रस  »  लहर 1: विभाव (आनंदवर्धक अवस्थाएँ)  »  श्लोक 262
 
 
श्लोक  2.1.262 
यथा —
प्रतिकुले’पि स-शूले, शिवे शिवायां निरंशुकायां च ।
व्यलुनाद् एव मुकुन्दो विन्ध्यावलि-नन्दनस्य भुजान् ॥२.१.२६२॥
 
 
अनुवाद
यद्यपि शिवजी ने अपने त्रिशूल से तथा बाण की माता ने, जो वस्त्रहीन होकर प्रकट हुई थीं, उनके कार्य में बाधा डाली, फिर भी मुकुंद ने बाणासुर की भुजाएँ काट दीं।
 
Although Shiva with his trident and Bana's mother, who appeared naked, obstructed his task, Mukunda still cut off Banasur's arms.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)