श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 2: दक्षिणी विभाग: सामान्य भक्ति रस  »  लहर 1: विभाव (आनंदवर्धक अवस्थाएँ)  »  श्लोक 261
 
 
श्लोक  2.1.261 
स्थैर्यम् —
व्यवसायाद् अचलनं स्थैर्यं विघ्नाकुलाद् अपि ॥२.१.२६१॥
 
 
अनुवाद
“अपने कर्तव्यों में स्थिर रहना, भले ही वे बाधाओं से भरे हों, इसे स्थिरता [स्थिर्य] कहा जाता है।”
 
“Staying steadfast in one’s duties, even if they are full of obstacles, is called stability [sthira].”
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)